भाषाई बेड़ियों से मुक्ति का रास्ता- प्रमेन्द्र सिंह भाटी एडवोकेट

प्रमेन्द्र सिंह भाटी एडवोकेट  पूर्व अध्यक्षडिस्ट्रिक्ट बार ऐसो नॉएडा गौतमबुद्धनगर

किसी भी देश के नागरिकों का इससे ज़्यादा दुर्भाग्य क्या होगा कि देश को अंग्रेजों की ग़ुलामी से मुक्ति मिले ७३ वर्ष बीत गये किन्तु उनकी भाषा अंग्रेज़ी से मुक्ति नहीं मिल पायी जिसके कारण राममंदिर पर आये फ़ैसले को १३५ करोड़ देशवासियों में से एक प्रतिशत नागरिक भी नहीं पढ़ पाये होंगे कई बार देखने में ये भी आया है कि अपने आप को पढ़ा लिखा साबित करने हेतु अंग्रेज़ी भाषा में बोलना अथवा अंग्रेज़ी में भाषण देना पड़ता है किसी विशेष भाषा का ज्ञान होना अतिरिक्त योग्यता हों सकती हैं किन्तु योग्यता क़ा एकमात्र मानक नहीं हो सकता भाषाई ग़ुलाम होना मानसिक दिवालियेपन का धोतक हैं तथा देश की सत्ता व संसाधनों से आमजन को दूर रखकर ग़ुलाम बनाए रखने की साज़िश व देश प्रति ग़द्दारी हैं आज़ादी का एहसास हर छण और हर ओर कराना सत्ता का दायित्व और स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिकों का अधिकार है वर्तमान शिक्षा नीति में शिक्षा माफ़ियागिरी कर बने धनकुबेरो के समूह जो बड़े बड़े विश्वविद्यालय के मलिक बनकर शिक्षा को उद्योग की तरह केवल नोट छापने की मशीन के तौर पर संस्थानों की इमारतों व उन इमारतों में पढ़ने के लिए प्रवेश लेने वाले बच्चों को कच्चे माल की तरह अधिक से अधिक धन कमाने का माध्यम बनाकर अपनी धनलोलिप्ता की नीतियो का परिमार्जन करने में मशगूल हैं नई शिक्षा नीति के लिए शिक्षा नीति निर्मात्री समिति में सरकार द्वारा भी बहुतायत में निजी शिक्षण संस्थानों के प्रवक्ता ,प्रधानाचार्य व कुलपतियों को वर्तमान शिक्षानीति की निर्मात्री समिति में शामिल कर लिया गया हैं सोचने को मजबूर होना पड रहा है कि क्या ये शिक्षाविद नागरिकों को पुरानी पद्धति से मुक्ति दिला पाएँगे यह पूर्ण रूप से संदेस्पद है क्या देश व प्रदेश सरकारों के पास सरकारी संस्थानों में कार्यरत निस्वार्थत शिक्षाविदो का अभाव है या जान पूछकर नई नीति के नाम पर पुरानी नीति की काम चलाऊँ मरम्मत करने का उद्देश्य मात्र है क्या इन तथाकथित निजी संस्थानो के तथाकथित शिक्षाविदो का संस्थानो के मालिकों से उनके हित व स्वार्थसिद्ध करने से मोह भंग हों गया हैं या निजी शिक्षण संस्थानों के शिक्षाविद अपने मालिक जिनके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं व वेतन से इनकी गुज़रबसर हो रही हैं उनके अपने निजी हित में दिये गए निर्देशो को मानने से इंकार कर देंगे तथा अपने आकाओ के निर्देश व हित को त्यागकर लोकहित में निस्वार्थता के वशीभूत होकर मानव स्वभाव के विपरीत देश के नागरिकों को भाषाई बेड़ियों से  स्वतंत्रता दिला पायेगी जिस देश में नागरिक अन्वेषण का माध्यम उसकी अपनी निज भाषा में करेंगे वहाँ उच्च प्रौद्योगिकी का विस्तार अधिक होगा अन्यथा बड़ा अन्वेषण जुगाड़ की परिभाषा में सिमटकर रह जाता है क्योंकि साधारण व्यक्ति की बड़ी खोज को अन्वेषण का प्रमाणपत्र इसलिए नहीं मिल पाता की उसको तथाकथित अन्वेषण की प्रमाणित भाषा का ज्ञान नहीं होता इसी प्रकार न्याय माँगने व देने की भाषा जब नागरिक की भाषा अपनी नहीं होगी तो उसके लिए न्याय देने से ज़्यादा दिलाने वाला माध्यम महत्वपूर्ण हो जाता हैं फिर चाहे वो व्यक्ति हो धन हो अथवा पद जिसका सबसे ख़राब परिणाम ये होता हैं कि नागरिक का सरकारी तंत्र और अंतोगत्वा लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा कम हो जाता है जो देश व समाज के लिए बड़ा ही घातक होता है यदि वाक़ई नई शिक्षा नीति के माध्यम से देश की दशा और दिशा बदलने का ईमानदारी से प्रयास है तो उसका एक मात्र रास्ता निस्वार्थ शिक्षा नीति निर्मात्री समिति के माध्यम से पूरे देश में एक देश एक ध्वज की तर्ज़ पर एकल शिक्षा नीति अर्थात समान नागरिक शिक्षा नीति बनाकर देश को दुनिया का सरताज बनाया जा सकता है जिस देश की अन्वेषण व न्याय माँगने और देने की भाषा अपनी नहीं हो सकती वहाँ शोषण तथा भ्रष्टाचार को कोई रोक नहीं सकता रामराज की तो कल्पना ही बेमानी है                      लेखक           

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